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अकबर महफूज आलम रिजवी


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रेत की परतें (कहानी, भाग-2)

Posted On: 5 Mar, 2015  
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Hindi Sahitya social issues में

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रेत की परतें (कहानी, भाग-1)

Posted On: 5 Mar, 2015  
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Hindi Sahitya social issues में

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यही है हमारा लोकतंत्र

Posted On: 28 Dec, 2014  
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Hindi Sahitya social issues कविता में

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दुखी मत होना मेरे भाई

Posted On: 13 Dec, 2014  
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social issues कविता पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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तीन अनमनी-अर्थहीन कविताएँ

Posted On: 19 Feb, 2014  
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Hindi Sahitya social issues कविता में

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गुब्बारा लोकतंत्र का टोपी युग

Posted On: 31 Jan, 2014  
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Contest Hindi Sahitya कविता में

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सृष्टि के सिर पर सभ्यता का फोड़ा

Posted On: 25 Jan, 2014  
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Contest Hindi Sahitya कविता में

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यही है हमारा लोकतंत्र

Posted On: 3 Oct, 2013  
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Hindi Sahitya Politics Special Days social issues में

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ब्लॉगिंग ने बनाया हिन्दी को पॉपुलर

Posted On: 12 Sep, 2013  
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Contest में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय रिजवी जी, इस मंच पर इतनी सार्थक कविताएँ पढ़कर आश्चर्य भी हुआ और बेहद खुशी भी | आस्था-विहीन व कुंद निष्ठा वाले आज के मानस पर तीव्र वैचारिकता से प्रहार करती ये कविताएँ वर्तमान लोकतंत्र का सटीक पाठ ही नहीं प्रस्तुत ही करती हैं, सटीक व्याकरण भी रेखांकित करती हैं --- "यह किसी मूर्ख हरिश्चन्द्र का सतयुग नहीं है जहाँ रहते हो तुम वह प्रबुद्ध लोगों का लोकतंत्र है यहाँ जो भी होगा वह यथार्थ-सम्मत आईन से होगा दुःस्वप्नों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की न तो परंपरा है और न ही कोई संवैधानिक प्रावधान!" ००००० "इसलिए अब नींद के झाँसे में नहीं आने वाला अब नहीं सोऊँगा मैं, कि अब जगा ही रहूँगा क्योंकि सपनों की भ्रूण-हत्या से बेहतर है यही कि गर्भधारण की संभावना ही हो जाए ख़त्म कि एक माँ के लिए इससे अच्छा रास्ता क्या है? जब संभावनाओं की जगह छीन रही हो आशंका और वैसे भी दुःस्वप्नों के बीच पलने वाला बच्चा बड़ा होकर सुंदर दुनिया का ख़्वाब नहीं देख सकता और कोई माँ अपनी औलाद को, अपनी नज़र के सामने धीमे-ज़हर के ज़ेरे-असर तिल-तिल मरता कैसे देख सकती है!" ००००० "माफ़ कीजिएगा महाकवि आप में साहस की कमी है आप गोदान के होरी हैं जिसकी गर्दन ज़मींदार के पैरों तले दबी है जिसके समझौतावादी स्वप्न में खूँटे से एक अदद गाय बंधी है आपका ठिगना क़द तो है लेकिन आप मैला आँचल के बावनदास नहीं हैं कि बावनदास की आज़ादी तो तीलियों से बिंधे पहिये के नीचे दबी है और विचार की पोथी वाली थैली चिथड़ा पीर के हिस्से पड़ी है आपके लिए भले हों लेकिन मेरे लिए तो ‘हाँ’ ‘ना’ महज दो शब्द नहीं हैं।" ००००० ....इतनी उम्दा कविताओं के लिए सहृदय साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

यमुना जी हम आपकी बातों से सहमत हैं। लेकिन मेरा कहना विशेष संदर्भ में है। हिन्दी दिवस मनाना और बेटे का जन्मदिन मनाना। दोनों में बहुत फ़र्क़ है। बेटे का जन्मदिन खुशी को सेलेब्रेट करने के लिए मनाया जाता है। हिन्दी-दिवस मनाने का मक़सद हिन्दी-भाषा का प्रसार और प्रोमोशन है। और किसी भी भाषा का विकास दिन अथवा सप्ताह विशेष में कुछ रस्मी आयोजनों के माध्यम से कतई संभव नहीं है। इसके लिए फुलप्रूफ और ईमानदार प्लान-प्रयास की ज़रूरत होती है। जबकि इस आयोजन में ऐसा कहीं नहीं दिखता। इसलिए हम तो कम से कम यह नहीं ही मान सकते कि हिन्दी-दिवस उपलब्धि, सफलता या सरोकार को बढ़ावा देने वाला है। कर्मचारियों के लिए यह महज सरकारी ढकोसला ही है।

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ढ़ सौ साल में अगर कोई भाषा विश्व की तीसरी बड़ी भाषा के रूप में स्थापित होती है, तो यह अपनेआप में बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए। इसीलिए जब हिन्दी-भाषा के अस्तित्व संकट की कोई बात करता है तो यह मुझे स्यापा अथवा मिथ्या-विलाप से अधिक नज़र नहीं आता। यदि मेरी बात आपको ग़लत लगती है तो आप बेशक हमें उदाहरण के माध्यम से ग़लत साबित कर सकते हैं। भाषाओं के बीच शब्दों का आदान-प्रदान, टॉनिक का काम करता है। यह भाषा की कमज़ोरी नहीं, शक्ति है। अँग्रेज़ी में मूलतः अँग्रेज़ी के कितने शब्द हैं? उसने लैटिन, संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फारसी, अरबी, दक्षिण भारतीय भाषाओं या कि रूसी और दूसरी अन्यान्य भाषाओं से कितने शब्द लिए हैं? जब आप इसकी गणना करेंगे तो सहज ही समझ जाएँगे कि आख़िर अँग्रेज़ी फ्रैंक्वा-लिंग्वा कैसे बन गई। एकदम सटीक रिज़वी साब !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

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प्रिय अलार्मिंग अलार्म जी, मीडियाकर्मी क़यास लगाता है... लेकिन वह भूत और वर्तमान के आईने में ही ऐसा करता है। व्यक्तिगत रूप से मैं इस बात का हिमायती हूँ कि हवा-हवाई बातों या लफ्फाजियों से या शाब्दिक लच्छेबाज़ी से कोई बात बड़ी नहीं हो जाती। अभी हम इतने फ्री भी नहीं हुए कि टाईम पास मजबूरी बन जाए। ख़ैर, ये बेमतलब की बातें हैं। किसी बात की ऑथेंटिसिटी की जाँच के लिए निष्पक्षता के धरातल पर खड़ा होना होता है, इसके बिना विश्वसनीयता संभव नहीं है। हम सिर्फ इसलिए ऑल इज़ वेल नहीं कह सकते कि इससे आप खुश हो जाएंगे। रही विकास की बात तो इसकी अवधारणा बेहद जटिल है। कभी आप मिलें, फिर हमलोग इस पर बातचीत कर सकते हैं। आपने जो बातें लिखी हैं, वह बहुत अधिक सांकेतिक हो गई है। हम विकास के मोदी या नीतीश या कांग्रेस मॉडल के समर्थक नहीं है। हमारे हिसाब से विकास सिर्फ शेयर सूचकांक का जम्प नहीं है। रही इस लेख की बात तो मैंने जो सवाल उठाए हैं, वह महत्वपूर्ण है। मैंने कैसे लिखा है... इसका महत्व नहीं है। आप ही बताएँ, जिस अमेरिका के इर्द-गिर्द मनमोहन सरकार की अर्थनीति घूम रही है, अगर मोदी प्रधानमंत्री बन भी गए और उन्होंने भी अमेरिका की ही परिक्रमा को प्रश्रय दिया तो फिर बदलाव का क्या अर्थ? आशावादी होने का यह अर्थ तो कदापि नहीं होगा(आपके लिए भी) कि जो सामने घटित हो रहा है, उसको भी स्वप्न मान लिया जाए। मोदी को भारत की जनता द्वारा चुना जाना है, अमेरिका द्वारा नहीं। क़ायदे से मोदी का वीजा रद्द किए जाने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका का विरोध होना था। वह नहीं हुआ। कम से कम बीजेपी को बायकॉट करना था वो भी नहीं हुआ। मतलब अमेरिका के सामने नतमस्तक होना हमारी नियति है, या कि हमने मान लिया है... यह न सिर्फ हमारे स्वाभिमान और देश की सम्प्रभूता के लिए ख़तरा है। लेकिन हम यह मानने को तैयार नहीं हैं। हम वीजा-वीजा चीख़ रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की जो आशावादी छवि बनती है, वह बीजेपी के ताज़ा एप्रोच से टूटती है और उम्मीदों का दामन भी छूटता है। ...यह किसी व्यक्ति के विरोध का मसला नहीं है... यह निराशा जनित खीझ का मामला है। शायद आप समझ सकें। वैसे आप अपनी राय बनाने और अमल करने के लिए स्वतंत्र है और हमें इस पर ऐतराज़ नहीं होना चाहिए।

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

फटाफट क्रिकेट और दीर्घकालीन राजनीति, दोनों में ही भारतीय कप्तानों की रणनीति से सम्बंधित कुछ भी स्पष्ट अंदाजा लगाना हमारे लिए असंभव सा है, फिर भी हम भावुक भारतीय दर्शक वह करते रहते हैं, और बारम्बार खुश या मायूस होते रहते हैं. कयास लगाना हम भारतीयों की पुरानी आदत है, खासतौर पर मीडियाकर्मियों की! पर अब चूँकि खेल के ढंग बदल चुके हैं तो हमारे कयासों में भी परिपक्वता अपेक्षित है! खासतौर पर तब तो अवश्य, जब हमें सही मायनों में विकास की सीढ़ियाँ चढ़ना हो; ..हमें कुछ पुरानी बेड़ियाँ तोड़कर आशावादी, सकारात्मक एवं रचनात्मक होना होगा, इसका कोई पर्याय नहीं! मात्र टाइम-पास के लिए बेतरतीब कयास लगाना ठीक नहीं और न ही शब्दों के लच्छे बनाना!

के द्वारा: Alarming Alarm Alarming Alarm

के द्वारा: Sumit Sangwan Sumit Sangwan

सच कहने से शर्माने वाले इंसान नहीं होते। हम मोदी भक्तों की बात तो दूर, ख़ुद मोदी से भी नहीं डरते-घबराते। दीपक चौरसिया का वैचारिक पक्ष सभी को पता है। इसलिए अगर कोई मोदी भक्त उनके खिलाफ कोई बात कहता है, तो यह उन भक्तों की सीमा होगी। अमर्त्य सेन या शत्रुघ्न वाले एपिसोड में जो कुछ भी अंधभक्तों ने किया... वह उन दोनों के लिए तो नहीं, लेकिन मोदी और बीजेपी के लिए ही ज़्यादा खतरनाक साबित हुआ। आप लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति के पक्ष को सभ्य तरीके से काउंटर कर सकते हैं। अभद्रता से नहीं। लेकिन इन मामलों में अभद्रता बरती गई। और इस तरह वह जिन चीज़ों की रक्षा का दावा करते हैं, उसी की तिलांजलि पहले दी... तो यह उनकी सोच का मसला है। मेरे या आपके परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। वैसे हम छांटते नहीं, लिखते है। और हवा में उड़ने वाले क्या ख़ाक ज़मीन पर रहने वालों की हवा निकालेंगे। आप निश्चिंत रहें। हम आलोचना से नहीं डरते।

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

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के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

जनाब अकबर साहब , भारतीय विजुअल मीडिया का हिस्सा होते हुए भी उसका सच कहने के लिए साधुवाद. सप्ताह का बेस्ट ब्लोगर चुने जाने पर बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाए.  अमरीका में किसी भी त्रासदी के समय लाशे और खून दिखने की होड वह का विजुअल मीडिया नहीं करता. विलाप की जगह वह प्रार्थना सभाएं दिखाई जाती है. इसके बिलकुल उलट भारतीय विजुअल मीडिया मातमी धुन के साथ विलाप करते परिजनों को दिखाता है और लाशो तक पहुचने की मानो होड सी लग जाती है. सुबह से शाम हो जाती है एक ही खबर और बार बार, एक जैसे सवाल पूछते उदघोषक ही दीखते है. पता नहीं हमारा विजुअल मीडिया कब परिपक्व होगा. पुनः बधाई, सादर , राजीव वार्ष्णेय

के द्वारा: Rajeev Varshney Rajeev Varshney

अभी देखा कि आपका यह लेख 'सप्ताह का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग' के रूप में चयनित हुआ है. पहले मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें. मध्यवर्ग से सभी को बहुत आशा रहती है, यह थोड़ी ज्यादती है. सरकारी-गैरसरकारी सभी जगह विभिन्न अदूरदर्शी निर्णयों और भ्रष्टाचार की वजह से होने वाले सभी घाटों और नुकसान की भरपाई बेचारा मध्यवर्ग ही तो करता है. और आपके मुताबिक पिसने वाले को ही विद्रोह के लिए प्रथमतः खड़ा होना होगा, आगे आना होगा! ठीक ही है कि बीमार और भुक्तभोगी ही क्रमशः हॉस्पिटल या पुलिस-थाने-कोर्ट वगैरह जाता है! ...जब जख्मी, मृत या उनके आश्रितों को पग-पग पर अपनी हर लड़ाई (a to z) स्वयं ही लड़नी है तो फिर किसी मीडिएटर (उपरोक्त कथित) की देश को ज़रूरत ही क्या? क्या हर जगह हर चीज को व्यवस्थित रखना/करना स्वयं भुक्तभोगी का ही काम है? यदि ऐसा है तो आकाओं की क्या आवश्यकता? फिर चुनाव, टैक्स, व्यवस्था आदि की प्रासंगिकता ही क्या? ...कृपया बुद्धिजीवी वर्ग मेहरबानी कर हर ताले की कुंजी के लिए दबे-कुचले फिर भी हंसने को मजबूर 'मध्यवर्ग' की ओर न निहारे.

के द्वारा: Alarming Alarm Alarming Alarm

ख़ूब कहा आपने! मेरा विचार है कि किसी भी बिगड़ी हुई सामाजिक आदत के ठीक होने की शुरुआत उस समाज के ऊपरी तबके, अर्थात् अभिजात वर्ग से होती है. इसका सबसे बड़ा कारण यह कि अभिजातवर्ग आम लोगों का नेतृत्व कर रहा होता है और शेष बहुसंख्य मात्र अनुयायी होते हैं. अभिजात वर्ग माने- ..नेता, अभिनेता, बड़े अधिकारी, धर्म अथवा सांप्रदायिक गुरु, प्रसिद्ध खिलाड़ी, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज, समाजसेवी यानी एक शब्द में और व्यक्त कर सकते हैं इनको कि 'समाज की क्रीमी लेयर'. ..अब इन सबमें भी जितने ऊपर से प्रथमतः शुरुआत हो सके वह बेहतर! अधिकांशतः हर व्यक्ति अपने से ऊपर वाले को टकटकी लगाकर देखता है और उसका अनुकरण व अनुसरण करता है! दो टूक यह कि निश्चित रूप से बदलाव की बड़ी जिम्मेदारी ऊपर के उन लोगों की ही बनती है- जिनके पास सत्ता है, अधिकार हैं, संसाधन हैं, नाम है, रसूख है, मान है व अनुयायी हैं, ..और अखबार व मीडिया के सर्वेसर्वा (आका, मालिक, संपादक) भी इन लोगों में शामिल हैं ही. ..जब ये भी भ्रष्ट हो गए हों तो इनसे ऊपर की सत्ताओं को प्रभावशाली कदम उठाना होगा. .. और यदि वे भी भ्रष्ट रहती हैं एक लम्बे समय तक, तो आम जनता में से ही कोई नेता निकलेगा जो अगुवाई करेगा उस क्रांति की जिनसे स्थितियां बदली जा सकें! ..शायद किसी आपातकाल में कोई सेनाधिकारी ही कोई बड़ा कदम उठा ले. ..इतने विकल्पों के बाद भी यदि परिस्थितियां जस की तस रहती हैं तो फिर हमारा राष्ट्र और नीचे ही जाएगा शनैः-शनैः! ..और तब अमेरिका जैसा कोई उन्नत राष्ट्र भारत की मामले में भी उसी प्रकार हस्तक्षेप करेगा जैसे वह अभी कुछ देशों के हालात ठीक करने के लिए ले रहा है. इसे आप सही कहें या गलत, परन्तु सत्य तो यही है कि कहीं भी हो रहा कोई भी नुकसान बड़े अर्थों में सम्पूर्ण विश्व का ही नुकसान है, और उस नुकसान को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए.

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अगर देश लोकतांत्रिक है तो सभी को जीवन का अधिकार है। अगर देश जनतांत्रिक है तो सत्ता का वास्तविक दायित्व, जनहित होना चाहिए। अगर जनतंत्र में जनता का हित, चंद पूंजीपतियों की तिजोरी भरने की शर्त पर सत्ता द्वारा अपहृत कर लिया जाए, तो समस्या पैदा होती है। नक्सली ग़लत कर रहे हैं। उन्हें सज़ा मिले। लेकिन सत्ता-पोषित आतंकवाद, लूटतंत्र और भ्रष्ट-व्यवस्था के ख़िलाफ़ कौन अभियान चलाएगा? सत्ता को निर्देशित करने वाले हमेशा सात पर्दों की आड़ लिए रहते हैं। देश और संसाधनों से ज्यादा इनके सुरक्षा-प्रबंधों पर ध्यान दिया जाता है। किसी ख़ास कम्पनी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए नीतियाँ बदल दी जाती हैं। ऐसी निर्लज्ज स्थिति में आम-आदमी क्या करे? क्या सभी को अन्ना की तरह टोपी लगाकर, किसी चौराहे पर बैठ जाना चाहिए या केजरीवाल की तरह पार्टी बना लेनी चाहिए? या कि सभी को सामूहिक रूप से ख़ुदकुशी कर लेनी चाहिए? नक्सली समस्या आजकल की नहीं है। काफी पुरानी है। नेताओं को जब अपने पर आती है तभी सरकार जागती है ! बढ़िया लेखन , आपको बेस्ट ब्लॉगर की बधाई !

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कहीं ऐसा तो नहीं कि लॉर्ड लिटन की दृष्टि में वही व्यक्ति उच्च-सामाजिक स्थिति वाला हो सकता था, जिसकी अंग्रेजों(सिस्टम) के प्रति स्वामी-भक्ति असंदिग्ध हो! ताकि व्यवस्था में उसकी भागीदारी क्राउन के लिए ख़तरा नहीं बन सके! निस्संदेह आईसीएस परीक्षा के लिए शर्तों को कठोरतम बनाने और मनोनयन द्वारा अपने विश्वासपात्रों में पद बांटने के लिए ही लिटन ने यह क़ानून बनवाया था। आज़ादी से पहले क्राउन के ‘बिहाफ’ में ईस्ट-इंडिया कम्पनी और वायसराय शासन करते थे। आज़ादी के बाद जनता के ‘बिहाफ’ में ‘देसी लॉर्ड’ का शासन स्थापित हुआ। मान्यता थी कि आज़ाद मुल्क की अपनी भाषा भी होती है। लिहाजा सर्वसम्मति से ‘हिन्दी’ भारत की ‘राजभाषा’ घोषित कर दी गई। लेकिन हिन्दी जनता की भाषा थी। और जनता की भाषा में राजकाज का कोई इतिहास नहीं था। इसीलिए ‘भारत का संविधान’, दरअसल ‘कंस्टिच्यूशन ऑव इंडिया’ का अनुवाद है। बहुत सटीक जानकारी वाला लेखन ! नयी जानकारी मिली

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के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

हमारे देश में ही नहीं। दुनिया के तमाम मुल्कों में, यही कुछ नज़र आ रहा है। चारों तरफ संघर्ष। कहीं मुल्क, कहीं माटी की जंग। कहीं पाषाणी मानव तो कहीं संहारक का तांडव। नफ़रत और स्वार्थ का बाज़ार बढ़ता ही जा रहा है। प्रेम और त्याग जैसी भावनाएं विलुप्ति के कगार पर हैं। लोकतंत्र की आड़ में अल्पसंख्यक प्रभुवर्ग का सत्ता-लाभ। धर्म के नाम पर नफरत और फासिज्म का उद्वेगी विस्तार। विकास के नाम पर उद्योग और उद्योग के नाम पर शोषण। शोषण उनका, जो प्रकृति के संरक्षक हैं। क्या वाकई महाप्रलय या महाविस्फोट सृष्टि के लिए ज़रूरी है? सृष्टि के लिए संहार? बड़ी अटपटी बात है ना! जो नहीं है, उसके लिए… जो है, उसको खत्म कर देना। क्या हम पाषाण युग से वाकई बाहर निकल चुके हैं? सच कहूं तो मुझे व्यक्तिगत रूप से ऐसा लगता है जैसे हम फिर से पशानकाल में जा रहे हैं ! बहुत सटीक और मार्मिक , तार्किक लेख दिया है आपने ! रिज़वी साब

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के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

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के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

मीडिया मजदूर, मरता-झींकता, खौलता-गलता, आपके दर्द को ज़ुबान देता, ज़ोर-ज़ोर से चीखता रहता है। इस चीख़ में सिर्फ पेशागत मजबूरी नहीं, एक दूसरे क़िस्म की टीस भी होती है। शायद वह अपना दुख भी, उन तमाम लोगों के दुख से जोड़ लेता है। तभी तो शोषण, दलन और दोहन की अविरल धार में किसी तरह पैर जमाए हौसले के बूते टिका रहता है। जब वह स्क्रिप्ट लिखता है तो जो शब्दों का पैनापन और धार आप देखते हैं न, उसमें भी यही टीस शामिल रहती है। वैसे आप यह सब जानकर क्या करेंगे? यह नालों की वैसी गुमशुदा आवाज़ें हैं, जो न कहीं से उठती हैं और न ही कहीं पहुंचती हैं। सिर्फ राख के भीतर दबी आग की मानिंद गुपचुप सुलगती रहती हैं। हम जानते हैं। आप इन्हें दधिचि नहीं मानेंगे। रिज़वी साब , आज आपको सलूट करता हूँ ! दिल का दर्द निकालकर रख दिया आपने अपने लेख में ! इस लेख को वाही लिख सकता है जिसने या तो मंदी में काम किया हो या जिसने उन्हें इस तरह से देखा हो ! बहुत ही बढ़िया विषय और गज़ब का लेख

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के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

अस्सलाम वल्लेकुम, जनाब...................! परंपरा-संस्कृति, नीति-रीति। बदलना तो चाहिए ही। बदल गए तो कौन सा आसमान फट पड़ा। वैसे जब रिश्तों में स्थिरता नहीं रही तो देश और उसकी नीतियों में स्थिरता कहां से आ जाएगी? निठल्लों की तरह बैठे रहेंगे और बस बोलते रहेंगे। अरे मूव कीजिए… मूव…। मूव नहीं कीजिएगा तो आधुनिक युग का संत और विश्व-शांति का अगुआ आपकी इतनी और ऐसी ठुकाई करेगा कि मूव लगाने से भी राहत नहीं मिलेगी। देख नहीं रहे- अपने मनमोहन का क्या हाल बना रखा है!?.............................. क्या करार प्रहार किये हैं.........................दिल गार्डेन-गार्डेन हो गया................भारतीय होने के नाते मन में बस यही आ रहा है कि अपने दूसरों के बाग़ से फूल उखाड़कर अपने बाग़ में लगा दूँ......................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

महोदय मूव का अनुरोध जनता से ही है। क्योंकि जैसा कि आप जानते हैं सत्ता एक जड़ व्यवस्था है और वो व्यक्ति द्वारा संचालित होती है। और अंततः प्रत्येक व्यक्ति जो देश का नागरिक है, वो इसका अंग है। यानी मनमोहन सिंह सिर्फ प्रधानमंत्री ही नहीं, देश के नागरिक भी हैं। अंत में मनमोहन सिंह का जिक्र व्यंग्य के तौर पर किया गया है। संकेत ये कि सुपर पॉवर यानी अमेरिका ने यूपीए के पहले कार्यकाल में अपनी मर्जी के अनुरूप भारत सरकार से काम करवाने में कामयाबी हासिल की। परमाणु बिल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लेकिन दूसरे कार्यकाल में केन्द्र सरकार वास्तविक सच्चाईयों से मुंह चुराने में असहज महसूस कर रही है। वह अमेरिकी दबाव के बावजूद देश के रिटेल सेक्टर को विदेशी पूंजी के लिए खोलने को तैयार नहीं है। लिहाजा जिस प्रधानमंत्री को प्रभावशाली, सशक्त और समझदार की उपमा विश्व बिरादरी(अमेरिका) ने दी थी.., वही अब उसे बुरा बता रही है। यानी मेरे इशारों पर नाचो या फिर मूर्ख करार दिए जाने के लिए तैयार रहो।... मूव ऑन जनता के लिए यूज किया गया... आशय ये कि बीती बातों से या गौरव से वास्तविक सच्चाई नहीं बदल जाती। वक्त काफी बदल गया है, नीतियां परिवर्तित हुई हैं। व्यवस्था के अनुकूल खुद को ढालना आज की मजबूरी बनती जा रही है ऐसा नहीं होने पर बैकडेटेड या फिर विभिन्न आरोपों का भीगीदार बनाया जा रहा है। यानी आम जनता के लिए परिस्थितियां लगातार प्रतिकूल होती जा रही हैं। हमारे यहां खुले बाजार की नीति और नवीन आर्थिक ढांचा जो सरकार द्वारा अपनाया गया वो देश के सामाजिक आर्थिक परिदृश्य के अनुकूल नहीं था और नहीं है। ऐसे में विकसित राष्ट्र बनने के तथाकथित होड़ में जो कुछ भी हमारे पास था, हम उसको तेज़ी से गंवाते जा रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। लेकिन दुर्भाग्य से देश की बड़ी आबादी इसको समझने के लिए तैयार नहीं है। जबकि एक छोटा तबका जिसको इन तमाम चीज़ों से फायदा है.., वो प्रोपगेंडा में व्यस्त है। घोटालों का बाजार गर्म है। विश्व बिरादरी आंख दिखा रही है।... आशा है अब आप आशय समझ गए होंगे।

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

के द्वारा: Rita Singh, 'Sarjana' Rita Singh, 'Sarjana'

दिनेश भाई, अजय जी और प्रदीप जी.., हमने लेख में कहीं भी अन्ना या उनकी नीयत पर शक नहीं किया है। ज़रा ग़ौर से देखेंगे तो आप देख सकेंगे कि हमने अन्ना-बाबा की आड़ में देश में जारी एक विशेष सियासी मुहिम की तरफ संकेत किया है। अन्ना तब तक पूजनीय थे, जब तक दल गठन की बात उन्होंने नहीं की थी। दल गठन की घोषणा के बाद एक खास दल ने जिस तरह अन्ना को केन्द्र से धक्का देकर रामदेव को सामने किया.., हमारा लेख उस पर केन्द्रित है। दूसरी बात कि आंदोलन बड़ा या छोटा नहीं होता। मोटिव बड़ा-छोटा हुआ करता है। जहां तक भ्रष्टाचार की बात है तो हमेशा इसके लिए सरकार जिम्मेदार नहीं होती। क्या हम-आप.., कभी अपने गिरेबां में झांकने की कोशिश करते हैं। भीड़ में कोई भी खड़ा होकर नारा लगा सकता है। नारा लगाने से मानसिकता का पता नहीं चलता। साधना न्यूज़ के डायरेक्टर एन के सिंह के शब्दों में- पुरुषों की बच्चेदानी निकालकर(ईश्वर ने पुरुषों को बच्चेदानी नहीं दी है) बीमा की रकम हड़पने वाले नर्सिंग होम सरकारी नहीं थे। जिस डॉक्टर ने यह असम्भव संभव करके दिखाया वह भी कोई सरकारी डॉक्टर नहीं था। सब्जियों को रंग कर बेंचने वाला और ऊपर अच्छा चावल रख कर नीचे घटिया चावल बेंचने वाला दुकानदार भी कोई सरकारी अमला नहीं है। खाद्यान्न में मिलावट करने वाला, खोए में शकरकंद मिलाने वाला, बिज़ली की चोरी करने वाला, सड़क पर दारू पीकर गाड़ी से लोगों को कुचलने वाला, घटिया माल लगाकर फ्लैट बेंचने वाला, अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा न देकर डोनेशन के ज़रिए डॉक्टर बनाने वाला और फिर उसके एवज़ में दहेज की मोटी रकम लेने वाला, बेटियों की भ्रूण हत्या करने वाला, स्त्रियों की प्रताड़ना करने वाला कोर्ई सरकारी आदमी या संस्था नहीं है। ये हम सब में से ही हैं और ये अधिकांश कृत्य नैतिकता के दायरे में आते हैं न कि क़ानून के। आज प्रश्न यह नहीं है कि कोई ए.राजा है, कोई कलमाड़ी है बल्कि प्रश्न यह है कि कौन कलमाड़ी और ए.राजा नहीं है ? ऐसा माना जा रहा है कि या तो वह पकड़ा नहीं गया है या फिर कुछ मानसिक दोष है जिसके तहत वो अभी भी ईमानदार है। जो नैतिक है वो ज़रूर किसी मनोविकार से पीड़ित है और जो डी.एन.ए को भी दगा दे रहा है।..... आशा है, अब आप इस बहस को सही दिशा में ले जाएंगे।

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

अवसर बार बार दस्तक नहीं देता है। स्वतंत्र भारत में इससे बड़ा और इससे सफल आन्दोलन अब तक नहीं हुआ है। यह अब निर्णायक दौर में है। हम लोगों को अपना दर्शन बघारने का,बुद्धजीवी बनने का,अच्छा लेखक बनने का बहुत अवसर आयेगा किन्तु देश के लिये इतनी बड़ी सेवा का अवसर कदाचिद ही मिले। कोई सिद्धान्त,नियम,दर्शन,निर्णय या व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसकी आलोचना के लिये मसाला न मिल सके। शब्दों के जाल से जन साधारण में संदेह पैदा करना कठिन नहीं है,इस कार्य के लिये अब तक राजनीति करने वाली कम्पनियां लगी ही हुयीं हैं। ये उत्तरदायित्व हम स्वतंत्र लोगों का है (जो लोग किसी के हाथों बिके न हों) कि इस आन्दोलन के इस निर्णायक दौर में जिस तरह भी हो सके इसे सफल बनायें। http://ajaysingh.jagranjunction.com/2012/08/08/%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%a4%e0%a5%8c%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82%e2%80%a6/

के द्वारा: ajaykumarsingh ajaykumarsingh

रिजवी अन्ना के नाम मेरा यह ख़त भी पढ़ लीजिए आदरणीय अन्ना अंकल, आप इन दिनों मौन धारण किए हुए हैं तो बोलेंगे नहीं . चुपचाप बैठे रहने से टाइम पास नहीं होता . ऐसे में आप आज्ञा दें तो एक कहानी सुनाऊं ? . अंकल जी, एक बाबा था बहुत ही ज्ञानी-ध्यानी. पूरा गांव उसकी बहुत कद्र करता था क्योंकि वह तन-मन का सच्चा तो था ही, किसी से कुछ मांगने भी नहीं जाता था . गांव वाले अपनी श्रद्धानुसार जो कुछ भी उसे दे जाते, खा लेता और परमात्मा का भजन करता . पांच-सात मुस्टण्डों को लगा कि यह तो बड़े मजे का काम है कि दाढी बढाओ और बाबा की शरण चले जाओ. हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आए . बाबा को कंधों पर उठा कर उसकी जय बोलने लगे. जय बोलने पर हर कोई फिसल जाता है बेचारा भोला बाबा भी फिसल गया . अब ये चेले तसल्ली देने लगे ” अब देखना बाबा. हम गांव में जाया करेंगे और इतनी भिक्षा मांग लायेंगे कि बड़ा सा मंदिर बना देंगे. आप उसमें मज़े से भक्ति करना. आपकी भक्ति हो जाएगी और पूरे गांव के पापियों का कल्याण भी हो जाएगा.“ बाबा को उनके रंग-ढंग कुछ ठीक तो नहीं लगे पर उन्हे चेले बना ही चुका तो करता भी क्या, बेचारा. लेकिन, स्याने बाबा ने एक बात जरूर कही ” सब बातें बेशक भूल जाना मगर इतना जरूर याद रखना कि मैं साल में एक दिन शीर्षासन लगा कर मौन धारण किया करता हूं. उस दिन दुनिया बेशक इधर से उधर हो जाए लेकिन मैं किसी से कोई बात नहीं करूंगा .“ मुस्टण्डों ने इस बात को एक कान से सुना और दूसरे से निकाल भी दिया और गांव में जा कर धर्म के नाम पर चंदा इकट्ठा करने लगे. गांव ने पूरा सहयोग दिया और बाबा के साथ उनकी जय भी बोली जाने लगी . लेकिन अंकल, स्यानों ने सही कहा है कि पेट और जेब दोनों भर जायें तो उसके बाद हर किसी का काण्ड करने का मन होता है . बस फिर वही हुआ और उनमें से एक मुस्टण्डे ने गांव में घोषणा कर दी कि मंदिर-वंदिर छोड़ो, इस चंदे से हम दूकान खोलेंगे और दूकान से मुनाफा आएगा उससे मंदिर भी बनवा देंगे . अब तो पूरा गांव क्रोधित हो कर उनके पीछे और मुस्टण्डे बाबा की तरफ भागे जायें . मुस्टण्डे यह सोच कर कि बाबा के कहने से शायद गांव वाले उनकी बात मान लें . बाबा ने दूर से देखा, माज़रा समझा और चिमटा गाड़ कर शीर्षासन लगा गया. अब चेले दूर खड़े-खड़े देखें कि बाबा बचाएगा लेकिन बाबा तो मौन धारण कर चुका था . नतीजा यह हुआ कि मुस्टण्डों की गांव वालों ने बहुत भर्तसना की और घोषणा कर दी कि ये चेले कोई भक्त नहीं बल्कि व्यापारी ही निकले . हां, बाबा जरूर बाबा ही है . इससे आगे की कहानी तब सुनाऊंगा जब आप फिर कभी मौन धारण करेंगे . बुरा न मानें तो एक बात पूछूं अंकल जी, उस बाबा का मौन धारण करना तो मुझे समझ आता है लेकिन यह नहीं समझ आता कि आप बार-बार किस बात पर मौन धारण कर जाते हैं ? अब मौन खत्म करो तो अगली कहानी आप सुनाना, अंकल. हम बच्चों को बड़ों को कहानी सुनाने में उतना मज़ा नहीं आता जितना उनसे सुनने में आता है . सुनाओगे न अंकल ? आपका अपना बच्चा, मन का सच्चा, अकल का कच्चा --- प्रदीप नील

के द्वारा: pardeepneel pardeepneel

हम देशभक्त हैं। भ्रष्टाचार में लिथड़े नेता की चापलूसी कर सकते हैं। नफ़रत के बीज बो सकते हैं। लूट सकते हैं, कत्ल कर सकते हैं। लेकिन गद्दारी नहीं कर सकते। ये नया मुहावरा है। मीडिया ने गढ़ा है। जैसे राष्ट्रवाद का एक मुहावरा आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गढ़ रखा है। शब्द महत्वपूर्ण नहीं रहे। शब्दों का जो स्टॉक हमारे पास है, वो बहुत कम है। ख़बरों का दायरा तो बहुत बड़ा है, लेकिन अपनी सुविधा के लिए हमने उसे भी संकुचित कर दिया है। ख़बर वही है, जिसके बहाने आप स्टूडियो में खड़े एंकर नाम के प्राणी को चीखने पर मजबूर कर सकें। एंकर वही बेहतर है, जिसमें छोटी-छोटी घटनाओं पर भी बेवजह चीखने की क्षमता हो। वो क्या बोलता है, क्या पूछता है, उसकी बौद्धिक क्षमता कितनी है? ये सब बेकार के सवाल हैं।.......................बहुत खूब जनाब............................निःशब्द............................!

के द्वारा: अन्जानी- अनिल अन्जानी- अनिल

चैनल बदलिए ! ! ! बहुत खूब आपने सब कुछ बयां कर दिया है अतः मेरे पास बयां करने को कुछ भी नहीं और कोई देखे कोई सुने कोई पढ़े इसकी चाहत भी नहीं है बस लिखते जाता हूँ न छपने का गम ना छप जाने की ख़ुशी बात अपनी कुछ सुधि पाठकों को ठीक लगे और समर्थन मिले तो जरुर हौसला बढ़ता है बाकि विचारों के अम्बार में कौन किसके विचारों को सही,, कौन किस चैनल को अच्छा किसको बकवास कहता है क्या फर्क पड़ता है? चैनल को टीआरपी चाहिए वह १२३ करोड़ की आबादी में तो मिलती हीं रहेगी और एंकर अपनी बकवास और जोर जोर से करता रहेगा उसे तो लिखा लिखाया मजमून हीं तो पढना है अपना कहाँ कुछ कहना है , ना खुद से कुछ गढ़ना है . एक बहुत अच्छा ब्यंग लेख आपको बेस्ट ब्लागर की उपाधि जरुर मिलनी चाहिए जागरण जंक्शन एवं आपका धन्यवाद

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

अस्सलाम वल्लेकुम, जनाब.! 3) सीख सखा की याद नहीं पर हे गोविंद, हे गोविंद स्थानांतरित हुआ सिर कीचड़ में लिथड़ा मुखार्विंद कूप में डूबा पूरा भारत चीख रहे सब सिंध-सिंध अटकलपच्चू सभावादी सब बने एक्सपर्ट पी-पीकर रिंद (4) पेट की रोटी घटी, होठों की प्यास बढ़ी उद्योग बढ़ा, देश बढ़ा, बात बढ़ी कलवतिया वहीं पड़ी झोंपड़ी में नेता बढ़ा, वोट बढ़े, जनता में साख़ बढ़ी (5) सड़क, स्कूल और अस्पताल फीता काट हुए नेता नेहाल पात-पात पर भ्रष्टाचार का कीड़ा जनता लटकी डाल-डाल..........तत्कालीन समय के राजनितिक और सामाजिक व्यवस्था का स्पष्ट चरित्र चित्रण....हार्दिक आभार............! कृपया अपना इ-मेल चेक करना चाहें...........................!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

ज़नाब रिज़वी साहब; वैसे तों मै आप के लेख के ऊपर दी गयी टिप्पणियों में इजाफा नहीं करना चाहता था. लेकिन ज़नाब बात जब एक सरहद के पहरेदार से जुड गयी तों खामखा निगाहें इधर घूम गयीं. बेमुरौवत चश्मदीद क़ी खरी गवाही अनचाहे ज़लज़ले को परवान चढ़ाती है. कभी कभी इंसानियत को तरजीह देने के लिये कायनाती कानूनों को नज़र अंदाज़ भी करना पड़ता है. जहाँ तक मेरा खुद का ख़याल है, यही खुदाई हुक्म भी है. उस हकीकत को बयान करने से क्या हासिल होने वाला है सिवाय ज़िल्लत के जिसकी ज़िंदगी सिर्फ ज़ज्बातो पर ही तख़्त-नशीं है. बीते लम्हों को जुबां क़ी जुगाली नहीं बल्कि काबिलियत के लिये तलब करना चाहिए. जिससे इंसानी हिफाज़त एक नजीर बन सके. खैर, बिना नाम लिये मै आप के एक कोशिश क़ी वाहवाही ज़रूर करूंगा कि आप के पास एक गैरतमंद जिगर और तीखे हरूफ है. जो अपनी नज़रो में बेगैरती का सूरमा लगाए "ब्लागर माफिया" को बेपर्दा करने में बेहद ताक़तवर है. इशारा अगर समझें तों काफी है. क्योकि किसी के भी लेख पर मै कभी मुँह नहीं फाड़ता.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

भाई अनिल आपका आभार। सिस्टम में कुछ तकनीकी खराबी के कारण मैं चाहकर भी किसी भी कमेंट पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे पाया। लेकिन हां, आपने जिस तरह मेरी तरफ से मोर्चा सम्भाला और तुर्की ब तुर्की जवाब देने की कोशिश की। उसके लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया। खुशी इस बात की भी कम नहीं कि आपने मेरी भावनाओं को ठीक-ठीक समझा। लेकिन मेरा तात्पर्य साधन की शुद्धता से था। और आज के गिरगिटिया कल्चर पर प्रहार से था। जब तक हम दुरुस्त नहीं होंगे, दूसरों को तम्बीह करने का हक़ भी हम नहीं रख सकते। चाहे वो कोई भी क्यों न हो, खुद ईश्वर भी ऐसा करें तो उन्हें कठघरे में खड़ा करूंगा। अन्ना तो फिर भी मनुष्य हैं। क्या लिखूं बस आपकी सुर में सुर मिला देता हूं- इन्कलाब जिन्दाबाद। हम लड़ेंगे साथी, तब तक जब तक की लड़ने की ज़रूरत बनी हुई है।

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

भाई दिनेश जी... आपकी असहमतियां सिर आंखों पर... व्यक्ति को उन्हीं बातों को स्वीकार करना चाहिए जो पढ़ सुनकर उसकी अपनी जैसी लगने लगे... ख़ैर, गांधी का उदाहरण हमने इसलिए लिया था कि अपने अन्ना जी को बता सकूं कि धैर्य भी कोई चीज़ होती है। जनता को भी दम लेने दिया करें, पेट में जब अन्न होगा तभी अन्ना आंदोलन में लोगों का योगदान बढ़ेगा। भूखे रहकर सिर्फ अन्ना आंदोलन कर सकते हैं क्योंकि बाद में रस पिलाने कोई मंत्री या बड़ा अभिनेता या समाजसेवी आ खड़ा होगा। बाकी का पेट, मेहनत और पसीने की मशक्कत से ही आया करता है। दूसरे, जब आंदोलन लंबा खींचता है तो भटकाव की आशंका बढ़ती है और व्यवस्था उसे दबाने के तरीके ढूंढ निकालती है। तीसरी और महत्वपूर्ण बात कि रामलीला के बाद से अन्ना और उनके सहयोगियों ने भी वही रवैया अख्तियार किया जो वोट की सस्ती सियासत के लिए नेता करते हैं तो मोहभंग के अलावा क्या मिलना है। यहां अन्ना का प्रतिकार नहीं, बल्कि इस बहाने पैदा हुए जज्बे को दम तोड़ते देखने के कारण उपजी वेदना का छायांकन है। साथ ही इस बात का दुख भी कि इसी बहाने बहुत से चोर सरदारों की श्रेणी में शुमार हो गए। जेपी मूवमेंट के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ था। शोषण के खिलाफ प्रतिकार अच्छी बात है। शोषित रोटी चुराए क्यों, छीन क्यों न ले। अपने हक को छीनना और चोरी करना, दोनों दो चीज़ें हैं। आशा है, आप हमारी बातों से संतुष्ट होंगे। वैसे असहमतियां मुझे बेहद प्यारी लगती हैं और असहमति जताने वाला मेरा प्रिय मित्र हुआ करता है।

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

शैलेश जी आपकी आइडियोलॉजी क्या है, अभी मुझे नहीं मालूम। लेकिन हमने देखा है, इनदिनों हवा चली है। वो भी जो कभी भगत का भ तक अपनी जुबान पर लाने से गुरेज किया करते थे, भगत जी के भक्त हो गए हैं। धर्म के पोंगा पहरुए भी आजकल यही दो-तीन नाम चिल्ला रहे हैं। हमने न तो गांधी के आजादी में योगदान की बात की और न ही इन तीन सपूतों का अपमान किया है। ब्लॉग में मैंने जो बात लिखी है, वो बिल्कुल भ्रम मुक्त है। लेकिन मुझे लगता है अभी आपका भ्रम टूटा नहीं है। बुत हमको कहे काफिर.... इंसान अपने भ्रमों से मुक्ति पा ले, यही बड़ी उपलब्धि हो, हमारी अभी इतनी हैसियत नहीं कि दुनिया को दिग्भ्रमित कर सकें....

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

संतोषजी आपने बड़ी अजीब सी बात कह दी। इतिहास मैंने भी पढ़ा है। मैं भी जानता हूं नेताजी के साथ क्यों किया गया था ये सब। नेताजी की आइडियॉलजी का फॉलोअर हूं। महात्मा गांधी से प्रेम नहीं है। लेकिन उनके योगदान को सिरे से खारिज कर देने वाला कथित आत्मबल अभी मुझमें नहीं आया है। और ये क्या, मुद्दा कुछ भी हो, आजकल जिसको देखो, वही भगत, सुखदेव और राजगुरू रट रहा है। मैं इतिहास की बात नहीं कर रहा था, उसके सहारे वर्तमान को टटोल रहा था और टीम अन्ना की नैतिकता और उनके दावों की पड़ताल के साथ ही आज के राजनीतिक चरित्र को पहचानने का प्रयास कर रहा था। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र चंद राजे-रजवाड़ों और कुछ परिवारों के हाथ गिरवी क्यों है... कौन है जो इनको हमारा मसीहा बनाए बैठा है... और सबसे बड़ी बात की दूसरे पर उंगली उठाने से पहले हमने अपने गिरेबां में झांका या नहीं... खैर, अंत में इतना ही- मैं कहता आंखन देखी, तू कहता कागद लेखी। 

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

योगी सारस्वत जी, हम आपकी भावनाओं का सम्मान करते हैं। लेकिन... माफी भी चाहते हैं। देश में भ्रष्टाचार, लूट खसोट, शोषण, धर्म-जाति आदि के आधार पर सामाजिक डिस्क्रिमिनेशन और कई और ऐसी समस्याएं हैं। जिनसे हम भी उसी त्वरा के साथ नफरत करते हैं, जितनी की आप। हम भी आप ही की तरह देश से इन तमाम चीज़ों को खत्म करना चाहते हैं। हम भी अन्ना की तरह लड़ना चाहते हैं। लेकिन... हम इस बात से सहमत नहीं है कि एक चोर को इसलिए साधु मान लिया जाए, कि उसने छोटी चोरी की है। जब तक हम खुद अपने आचरण में अनैतिक हैं, तब तक दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना पूरी तरह से अनैतिक है। कपड़े व्यक्तिक, रहन-सहन व्यक्तिक हैं। विचार भी तब तक व्यक्तिक होते हैं, जब तक वो आप तक सीमित हों। लेकिन जब आप सार्वजनिक जीवन में आते हैं और दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं तो आपसे नैतिकता की मांग बुरी बात नहीं हैं। अगर आप व्यवस्था में व्याप्त दगाबाजी और ऐसा करनेवले दगाबाजों की तरफ उंगली उठाते हैं लेकिन खुद भी दगाबाजी करते हैं तो इसे हम ईमानदारी नहीं मानते।

के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

मित्रवर रिज़वी साब , नमस्कार ! आप कहते हैं की अन्ना की टीम पर दाग हैं तो हम कैसे उनपर भरोसा कर लें ! सही बात है आपकी ! अगर किसी ने स्कूल में अपने साथ वाले की पेन्सिल चुरा ली तो वो जीवन भर के लिए अपराधी हो गया ? कल को अगर कोई कहे की अरविन्द केजरीवाल लक्स के बनयान और underwear पहनता है तो वो देश की सेवा कैसे कर सकता है क्योंकि ज्यादातर देश के लोग तो पट्टे के कपडे के underwear पहनते हैं , तो हम उन पर भरोसा न करें ? किरण बेदी पैंट शर्ट पहनती है , बॉय कट रहती है वो कैसे देश की सेवा कर सकती है ? मित्रवर ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा , सिर्फ यही कहूँगा की इन लोगों पर भरोसा करना ही चाहिए ! ये लोग सच्चे लोग हैं और सरकार इन्हें बदनाम कर रही है! इन छोटी छोटी बातों से आन्दोलन भ्रमित नहीं हुआ करते ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

यह घुटना नेहरु के आगे नहीं टिका था बल्कि मानवता की खातिर. वरना यही विचारधारा के लोग जो बटवारा का दोष गाँधी को देते हैं चारों तरफ खून की नदियाँ बहा दिए होते.......आज आप कह आरहे हैं की जिन्ना को प्रधानमंत्री बना दिया गया होता तो यह घटना नहीं होती...............यह तो मान लीजिये लगभग ६०-७० साल पहले की बात हैं. मैं आज के परिपेक्ष में बात करता हूँ. आज जितने भी लोग गाँधी के उस निर्णय का विरोध करते हैं. वह यह भी कहते फिरते हैं कि देश का प्रधानमंत्री कोई मुस्लिम नहीं होना चाहिए भले ही राष्ट्रपति हो जाएँ. क्योंकि राष्ट्रपति तो कठपुतली होता हैं. परन्तु प्रधानमंत्री हो जायेगा तो देश को बेच देगा और मुस्लिम राज हो जायेगा. यह आज की मानसिकता हैं कल की क्या रही होगी इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता हैं. मैं किसी एक का पक्ष नहीं ले रहा हूँ.मैं हकीकत वयां कर रहा हूँ. मैं इसी लिए कभी व्यक्ति और समूह विशेष के विरुद्ध नहीं बोलता क्योंकि कमी तो हम सबके अन्दर हैं..,,,परन्तु मजबूर किया जाता हैं. ऐसा कहने के लिए. ऐसी बहुत चीजे है जो मैं सुनकर भी चुप रहता हूँ क्योंकि जानता हूँ कि यदि बोलूँगा तो और भी नफ़रत फैलता ही जायेगा............और आप जैसे विवेकी पुरुष से यही आशा करता हूँ कि अब भी वक़्त हैं अपने अन्दर पल रहे नफ़रत को मिटने की. हम सभी को एक साथ होकर, एक जुट होकर लड़ना हैं......वो भी बुराई के खिलाफ........तो सामाजिक और राजनितिक बुराई के विरुद्ध क्रांति के लिए हाथ मिलाइये........................और दिल से कहिये.........इन्कलाब ...............!....................जिंदाबाद!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जिस  महात्मा गाँधी को हमनें राष्ट्र  पिता से  सुशोभित  किया है,  उसे हम  समस्याओँ की जिम्मेदारी से कैसे मुक्त कर सकते हैं। यदि गाँधी जी चाहते तो देश  का बँटवारा भी नहीं होता, सब जानते हैं कि नेहरु और  जिन्हा के प्रधानमंत्री पद की महात्वाकांक्षा के कारण  देश  का बँटवारा हुआ   था।  उस  समय  सभी  काँग्रेसियों को मालुम  था कि जिन्हा  को केन्सर है और वह दो वर्ष  से अधिक  नहीं जी सकते थे। यदि गाँधी चाहते तो दो वर्ष  के लिये जिन्हा  को प्रधानमंत्री बनवाकर देश  का विभाजन  होने से बचा सकते थे। किन्तु गाँधी ने ऐसा नहीं किया और नेहरू जी के आगे घुटने टेक  दिये।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

अनिल  जी न  मैं अन्ना का भक्त हूं न  गाँधी जी का धुर  विरोधी। मैं एक  आम  आदमी हूँ और देश  की दयनीय  स्थिति से व्यथित  हूँ। व्यक्तिगत  दुखों से नहीं। अन्ना टीम  पर  उँगुली उठाने वाले  लोगों को  खतरा हो गया है, खतरा हो गया है अपने अस्तित्वहीन  होने का।आरोप पूर्णतः राजनैतिक  कुचक्र  का परिणाम  हैं।  मेरी दृष्टि में देश भक्त दो तरह के होते है, एक  तो प्रत्यक्ष  और दूसरे अप्रत्यक्ष। नेता जी आदि प्रत्यक्ष  और गाँधी जी आदि अप्रत्यक्ष  देश  भक्त थे। यह  विस्तृत विवेचन  का विषय  है। अप्रत्यक्ष  देशभक्त का एक  भेद छद्म  देशभक्त भी होता है। अब यह हमारे आपके ऊपर  है कि किसे किस  श्रेणी में रखना चाहेंगे।    हिेसा का अर्थ  केवल  किसी  का खून  करना ही  नहीं है किसी के अधिकारों  की हत्या, किसी की इच्छाओं की हत्या. और भी बहुत  कुछ  आता है।     केवल  किसी का खून  न  करने  से कोई  कोई  अहिंसक  नहीं  बन  जाता। अपने विचारों  के विपरीत  अत्याचार होते देखते रहना शायद अहिंसा की श्रेणी  में नहीं आता।      आतताईयों की हत्या करना, सैनिकों का युद्ध  क्षेत्र  शत्रु  का वध  करना शायद हिंसा  की श्रेणी में नहीं आता  है। यह मैं क्रांतिकारियों और गाँधी जी के संदर्भ  में लिख रहा हूँ। आप  चूँकि मुझसे अधिक  विद्वान  हैं, अतः मेरा मन्तव्य समझ  सकते  हैं।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

हे महान आत्मा यहाँ कौन कह रहा है की गाँधी होना जरुरी हैं. सुभाष चन्द्र और भगत सिंह भी हो सकते है पर हम खुद को गाँधी तो नहीं बोल सकते न. क्योंकि दोनों के अलग मार्ग हैं. यहाँ किसी व्यक्ति के मार्ग की बुराई नहीं हो रही हैं पर यदि आप आग पर चल रहें हैं तो खुद को कैसे कहेंगे की पानी से गुजर रहा हूँ. आप सुभाष और भगत सिंह बनने की बात कर रहें हैं. है आपके पास वो जज्बा उनकी तरह बनने का. यदि कोई सुभास चन्द्र और भगत सिंह दिख जायेगा तो आप ही जैसे लोग उसे आतंकवादी और उग्रवादी कहेंगे........और यदि कुछ समय के बाद वो कामयाब हो जायेंगे तो लोग उन्ही की पूजा करेंगे. इन महान क्रांति कारियों के शहादत का कारण गाँधी को जो लोग देते हैं. हकीकत यह है कि वह तो अपना मार्ग का अनुसरण किये. सुभाष, भगत सिंह और आजाद जैसे महान लोग मारे गए उसके पीछे आप जैसे लोग कारण थे. गांधीवादी विचारधारा के लोगों से कहीं ज्यादा संख्या सशत्र क्रांति के विचार धारा के लोगों की थी और आज भी हैं. तो यह सशत्र क्रांति की बात करने वाले लोग कहाँ सो रहें थे जिस समय इन महान सपूतों की बलि दी जा रही थी. चलिए छोडियें उस समय मान लेता हूँ कि लोगों को उतना कुछ नहीं पता चल पाया उनके बारे में. इसलिए मैं कल की बात नहीं करूँगा. मैं आज की बात करता हूँ. हे इस धरती के महान सपूत आपके अन्दर हैं वो जज्बा उनकी तरह बनने का ...................मैं अहिंसा की बात करने वाला उनके मार्ग का अनुसरण करने के लिए तैयार हूँ और मैं फेकुंगा सांसद में बम. लेकिन मैं खुद को गांधीवादी नहीं कहूँगा. मैं इस खुले मंच पर इसका ऐलान करता हूँ क्योंकि इस देश के नागरिकों की आँखें खोलने के लिए यह भी जरुरी हैं. क्या हैं आप मेरे साथ चलने के लिए तैयार?..........यदि नहीं तो देशभक्तों का तमाशा बनाना बंद करिए और शांति के साथ रहिये और औरों को भी रहने दीजिये. माथे का पसीना पोछ लीजिये . यदि गुस्सा आ रहा हैं तो एक गिलास पानी पी लीजिये. यदि फिर भी गुस्सा शांत नहीं हुआ तो बोरिया बिस्तर बांधिए और चलिए देश की रक्षा के लिए. हम पर गुस्सा करके आप कुछ नहीं पाएंगे. हाँ एक बात और......लड़ने का सौख हैं तो बुराई से लड़िये........व्यक्ति और समूह से नहीं....... हो सके तो दूसरों को बुरा कहने से पहले एक बार खुद के अन्दर झाक लीजिये...... एक बात और कहना चाहूँगा कि मैं अहिंसा का पुजारी हूँ और रहूँगा ......पर अहिंसावादी नहीं हूँ क्योंकि जानता हूँ कि कहीं न कहीं मैं उसे निभाने में कमजोर पड़ जाऊंगा क्योंकि वह मजबूतों का हथियार हैं कमजोरों का नहीं.......और मैं कमजोर हूँ क्योंकि अहिंसा की छोड़कर कभी-कभी हिंसा के मार्ग का अनुसरण करता हूँ जैसे कि अभी-अभी किया...

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

यहाँ पर किसी से किसी की तुलना नहीं हो रही रही है, दिनेश भाई! दोनों अपनी जगह पर महँ है . यहाँ बात हो रहीं हैं मार्गी कि यदि आपके हाथों में तलवार हैं तो उसे धनुष नहीं बोल सकते. यहाँ अन्ना टीम अहिंसा की बात कर रही हैं. तो स्वाभाविक सी बात हैं कि उनपर भी उंगली उठेगी यदि वह मार्ग से विचलित होंगे. यहाँ उनकी बुराई नहीं हो रही हैं. मैं भी उनका समर्थक हूँ. पर अँधा और बहरा नहीं हूँ और आपसे भी यही अपेक्षा करता हूँ. यदि अन्ना टीम सशत्र क्रांति कराती हैं तो उसका भी समर्थन मैं करूँगा. पर स्पष्ट तो होना ही चाहिए कि आपकी शैली कौन सी हैं. यहाँ आप दो देश भक्तों की तुलना करके देशभक्ति का अपमान किये हैं. आप तो एक विवेकी पुरुष हो. यदि आप को लगता है कि मैं गलत बोल रहा हूँ तो अपने घुटनों के बल खड़ा हूँ और आप मुझे मारकर सिद्ध कर दो कि आप शक्तिशाली हो और मैं कमजोर हूँ. क्योंकि आपकी तो यही न सोच है कि यदि सामने वाला घुटने टेकता हैं तो वह कमजोर है. तो क्या आप मुझे मारकर सिद्ध करोगे कि आप शक्तिशाली हो....आप जैसा व्यक्ति यदि इस तरह की बात करेगा तो निश्चय ही, मुझे विश्वास करना पड़ेगा की धरती से मानवता ख़त्म हो गयी है.....

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

नमस्कार आलम जी, क्या बढ़िया समीक्षा किया है आपने...मुझे काफी दिनों बाद फिल्मो और भारतीय समाज की मानसिकता को प्रतिफलित करता हुआ विश्लेषण पढने को मिला ....बिलकुल सही कहा आपने....पर मणिरत्नम जी दोनों ही फिल्मो से भारतीय जनमानस का चेहरा रखा क्योंकि ये दोनों चेहरे हमारे समाज से ही लिए गए...है.. और इसे आपने स्पस्ट भी किया है है की क्यों गुरु हिट है..और वीरा फ्लाप... ".फ्लॉप या अस्वीकार की असली वजह है कि साधन सम्पन्न का यशगान ही संभव है, आलोचना नहीं। गुरूकांत देसाई के सामने वीरा की औक़ात ही क्या है! दलित और संसाधन विहीन वीरा, सत्ता प्रतिष्ठान के स्वामी देव को नैतिकता का पाठ भला कैसे पढ़ा सकता है? वीरा का हृदय कैसे विशाल हो सकता है? बस यही वह कील है!" आपको बहुत-२ बधाई....लिखते रहे...

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

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अकबर जी मैँ आपकी कुछ  बातों से सहमत हूँ और कुछ  से असहमत, दो प्रमुख  असमत बातें- 1. उसके हीरे की चोरी हो गई,     भूख  से बेहाल, निष्प्राण  सा।    हो गया निशब्द, आवाज  आ   जाये,    हो गया पेट  की भूख  से विवश,   चुरा लिये खीरे,    आ   गई थोड़ी शक्ति,    उसने छेड़ दी हीरे की चोरी की बात,    चोर था चालाक , चिल्लाया,    ये खीरा चोर है,    मारो-मारो,    पकडों पकडों। 2.  भगत, असफाक  एवं राजगुरु,     बापू से कहीं अधिक  महान  थे।     बापू से नहीं, इन क्राँतिकारियों से,      अंग्रेज  कहीं अधिक  परेशान  थे।      अत्याचारी से निवेदन,      क्या धर्म  है।     मेरे अनुसार तो राष्ट्रीय शर्म  है।     और वह भी जब आततायी हो विदेशी,     तुम  नारा लगाते हो स्वदेशी।      क्या  असहयोग  आन्दोलन  वापिस  लेना था जरूरी,      बताइये क्यों कहते हैं,      महात्मा गाँधी का पर्याय है मजबूरी?

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रिजवी साहब नमस्कार / आज सुबह जब दैनिक जागरण में आपका व्यग्य पढ़ा तो खोज खोज कर थक कर मिला / ब्लॉग व् ब्लोगर के भीच कोई ब्लॉग ढूढना भूसे के ढेर में सुई ढूढना हें / सही हें दा ने सही बजट पेश कर दिया हें दिया सलाई को सस्ता करके / अंत समय में ये ही काम आती हें / दादा दूरदर्शी हें जिन्होनें इह लोक व् परलोक का टिकट सस्ता कर दिया / बस माचिस दिखाओ और समस्या से छुटकारा पा जाओ / सुईं भी काम की चीज हें / सरकार को पता हें जहाँ तलवार काम नहीं आती वहां सुई काम आती हें / धन्य है ये सरकार जो गरीबों को हटाने के लिए अथक प्रयास कर रही हें / इसका एजेंडा साफ़ हें न मर्ज रहे न मरीज / न अंधा नोते न दो जाने आयें / भाई वाह खूब लिखा हें आपने

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yogi sarswat जी व्यंग्य का सहारा हम तब लेते हैं, जब ये लगने लगता है कि सीधी बात सत्ता की समझ में नहीं आती । ये अपनी व्यथा है। हमारी आंखों की ठीक सामने तमाम तरह की बेइमानियां हो रही हैं। चोर व्यवस्था का पहरुआ है। वो बेशर्म मुस्कराहट और काइयां दलीलों से अपनी तमाम ग़लत को सही करार दे रहा है। हम देख रहे हैं। सत्ता व्यवस्था हो या बजट हो या कोई और नीति... वो हमारे या आमजन के लिए नहीं... मुट्ठी भर धन कुबेरों दर्जन भर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए हमारे नाम पर बनाई जा रही है। हमें बेवकूफ बनाया जा रहा है। ऐसे में मन के क्रोध को आप सभ्य भाषा में दर्ज नहीं कर सकते। धन्यवाद इस विधा का यहां ऐंचे-ताने भाव तमाम तनावों से मुक्ति की राह तो देते हैं। वैसे मैं हारुंगा नहीं काल... तुम्हें झुकना ही पड़ेगा।

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